एहसास किसी अपने को खोने के,
ख्याल से भी अब डर लगता है।
सोचता हूँ फिर, कि ऐसा क्यों है?
मुझे अपनी ही सोच से डर लगता है।
न सोचूँ जब इस दुनियादारी को,
तब सब कुछ कितना अच्छा लगता है।
वर्तमान से ज़्यादा मेरी सोच को,
आने वाले कल का डर लगता है।
हाँ, सिर्फ़ यही नहीं एक बात और है,
वह मुझमें रहकर मेरा ध्यान रखता है।
पर जब भविष्य भी वर्तमान बन जाए,
तब वह सब कुछ सामान्य कर देता है।
मेरी अपनी ही मानसिक स्थिति पर,
यह मेरा वश चलने नहीं देता।
मेरी अपनी ही सोच का घेरा है यह,
जो मुझे चैन से सोने नहीं देता।
एक दिन अपनी ही सोच को लेकर,
मैं घंटों तक बस सोचता रहा।
कि अगर मैं इसे मूर्ख बना पाऊँ,
तो समझो हर तनाव से मुक्ति पा गया।
फिर क्यों मैं अपने ही आप पर,
अपनी सोच को हावी होने दूँ?
दुनिया क्या कम है दर्द देने को,
जो मैं खुद अपने हृदय को आहत करूँ?
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